Tuesday, 6 October 2015

तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन





तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता रहूँ
तुम मुझे देखकर ,मुड़  के चलती रहो
मैं विरह में मधुर गीत गाता  रहूँ

मैं  ज़माने की ठोकर ही खता रहूँ 
तुम ज़माने को ठोकर ही लगाती रहो 
जिंदगी के कमल पर गिरुं ओस सा 
तुम रोस की धुप बनकर सूखाती रहो 

काँटों की राह सजाती रहो तुम
मैं   उसी राह पर रोज जाता रहूँ  
तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता रहूँ

मनाता हूँ प्रिये तुम मुझे ना मिलीं
और व्याकुल विरहा -भर मुझको दिया
लाख तोड़ा हृदय ,शब्द -आघात से
पर अमर गीत -उपहार दिया

तुम यूँ ही मुझको ,पल -पल में तोडा करो
मैं बिखर कर तराने बनता रहूँ
तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता रहूँ

तुम जहां भी रहो खिलखिलाती रहो
मैं जहां भी रहूँ बस  सिसकता रहूँ 
तुम नयी मंजिलों की तरफ बढ़ चलो 
मैं  कदम-दो-कदम चल के थकता रहूँ 

तुम संभालती रहो में बहकता रहूँ  
दर्द की ही ग़ज़ल गुनगुनाता रहूँ
तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता

Tuesday, 7 July 2015

Koi Deewana Kehta hai

कोई  दीवाना कहता है 

में उसका हूँ वो  इस अहसास से इनकार करती है 
भरी महफ़िल में वो मुझे रुसवा हर बार करती है 
यकीं है सारी  दुनिया को खफ़ा है मुझसे वो लेकिन 
मुझे मालूम है फिर भी मुझी से प्यार करती है 

कोई खामोस  है इतना बहाने भूल आया हूँ 
किसी की  तरन्नुम में  तराने भूल अया हूँ 
मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आसमां वालों 
में इक चिड़िया की आखों में  उड़ने भूल आया  हूँ  

मेरा प्रतिमान आँसू में भिगोकर गढ़ लिया होता 
अकिंचन पाँव तब आगे तुम्हारा बढ़ लिए होता 
मेरी आँखों में भी अंकित  समर्पण  की ऋचाएँ थीं 
 कुछ अर्थ मिल जाता जो तुमने पढ़ लिया होता 

तुम्हारे पास हूँ जो दूरी है , समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है , समझता  हूँ 
तुम्हें में भूल जाऊंगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन 
तुम्ही को भूलना  है ,समझता हूँ 

सदा  तो धूप के हाथों में ही परचम नहीं होता
खुशी के घर में भी बोलो कभी क्या गम नहीं होता
फ़क़त इक आदमी के वास्ते जग छोड़ने वालों
फ़क़त उस  आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता

Sunday, 5 July 2015

A poem on sacrifice of two lovers



मां बाप की इज्जत को बचाया होगा उसने बेटी होने का फर्ज निभाया होगा




प्रेमिका की शादी कहीं और हो जाती है तब प्रेमी कहता है...


आज दुल्हन के लाल जोङे में उसकी सहेलियों ने सजाया होगा

मेरी जान के गोरे हाथों पर सखियों ने मेहंदी को लगाया होगा

बहुत गहरा चढेगा मेहंदी का रंगा उस मेहंदी में उसने मेरा नाम छुपाया होगा 


रह रहकर रो पङेगी जब भी उसे मेरा ख्याल आया होगा

खुद को देखेगी जब आइने में तो अक्श उसको मेरा भी नजर आया होगा

लग रही होगी एक सुंदर सी बाला चांद भी उसे देखकर शर्माया होगा


आज मेरी जान ने अपने मां बाप की इज्जत को बचाया होगा उसने बेटी होने का फर्ज निभाया होगा

मजबूर होगी वो बहुत ज्यादा सोचता हुं कैसै खुद को समझाया होगा

अपने हाथों से उसने हमारे प्रेम खतों को जलाया होगा

खुद को मजबूर बनाकर उसने दिल से मेरी यादों को मिटाया होगा

भूखी होगी वो मैं जानता हुं पगली ने कुछ ना मेरे बगैर खाया होगा

कैसे संभाला होगा खुद को जब फैरों के लिए उसे बुलाया होगा


कांपता होगा जिस्म उसका जब पंडित ने हाथ उसका किसी और के हाथ में पकङाया होगा

रो रोकर बुरा हाल हो जाएगा उसका जब वक्त विदाई का आया होगा

रो पङेगी आत्मा भी दिल भी चीखा चिल्लाया होगा 

आज उसने अपने मां बाप की इज्जत के लिए उसने अपनी खुशियों का गला दबाया होगा
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