Monday 8 August 2016

Goblet of heart

Rumi said: Whoever is loved is beautiful, but this doesn’t mean that whoever is beautiful is loved. “There are girls more beautiful than Laila,” they used to tell Majnun. “Let us bring some to you.” “I do not love Laila for her form,” Majnun would reply.

“Laila is like a cup in my hand. I drink wine from that cup. I am in love with that wine. You only have eyes for the goblet and do not know the wine. A golden goblet studded with precious stones, but containing only vinegar, what use is that to me? An old broken gourd with wine is better in my eyes than a hundred goblets of gold.”

Guide From Beyond

The dark thought, the shame, the malice, meet them at the door laughing, and invite them in. Be grateful for whoever comes, because each has been sent as a guide from beyond.

Being a momentary guest

This being human is a guest house. Every morning a new arrival. A joy, a depression, a meanness, some momentary awareness comes as an unexpected visitor.

Tuesday 6 October 2015

तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन





तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता रहूँ
तुम मुझे देखकर ,मुड़  के चलती रहो
मैं विरह में मधुर गीत गाता  रहूँ

मैं  ज़माने की ठोकर ही खता रहूँ 
तुम ज़माने को ठोकर ही लगाती रहो 
जिंदगी के कमल पर गिरुं ओस सा 
तुम रोस की धुप बनकर सूखाती रहो 

काँटों की राह सजाती रहो तुम
मैं   उसी राह पर रोज जाता रहूँ  
तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता रहूँ

मनाता हूँ प्रिये तुम मुझे ना मिलीं
और व्याकुल विरहा -भर मुझको दिया
लाख तोड़ा हृदय ,शब्द -आघात से
पर अमर गीत -उपहार दिया

तुम यूँ ही मुझको ,पल -पल में तोडा करो
मैं बिखर कर तराने बनता रहूँ
तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता रहूँ

तुम जहां भी रहो खिलखिलाती रहो
मैं जहां भी रहूँ बस  सिसकता रहूँ 
तुम नयी मंजिलों की तरफ बढ़ चलो 
मैं  कदम-दो-कदम चल के थकता रहूँ 

तुम संभालती रहो में बहकता रहूँ  
दर्द की ही ग़ज़ल गुनगुनाता रहूँ
तुम स्वयं को सजाती रहो रात दिन
रात दिन में स्वयं को जलाता

Monday 13 July 2015

All night, the cold wind raged



All night, the cold wind raged ;
all night we made love.                                                                  

I cut some dead branches from the past ; you too
plucked leaves of times gone by .
I emptied my pockets
of all dried up poems;
you too took out shrivelled up letters.
I threw away the stale lines
of my palms,
you shed all moisture
from your eyelids.

Whatever we found growing
on our bodies
we chopped
and fed it to the fire.

All night we kept the flame alive
we fuelled the fire of our bodies;
all night we heated a love
gone cold.

Tuesday 7 July 2015

Koi Deewana Kehta hai

कोई  दीवाना कहता है 

में उसका हूँ वो  इस अहसास से इनकार करती है 
भरी महफ़िल में वो मुझे रुसवा हर बार करती है 
यकीं है सारी  दुनिया को खफ़ा है मुझसे वो लेकिन 
मुझे मालूम है फिर भी मुझी से प्यार करती है 

कोई खामोस  है इतना बहाने भूल आया हूँ 
किसी की  तरन्नुम में  तराने भूल अया हूँ 
मेरी अब राह मत तकना कभी ऐ आसमां वालों 
में इक चिड़िया की आखों में  उड़ने भूल आया  हूँ  

मेरा प्रतिमान आँसू में भिगोकर गढ़ लिया होता 
अकिंचन पाँव तब आगे तुम्हारा बढ़ लिए होता 
मेरी आँखों में भी अंकित  समर्पण  की ऋचाएँ थीं 
 कुछ अर्थ मिल जाता जो तुमने पढ़ लिया होता 

तुम्हारे पास हूँ जो दूरी है , समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है , समझता  हूँ 
तुम्हें में भूल जाऊंगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन 
तुम्ही को भूलना  है ,समझता हूँ 

सदा  तो धूप के हाथों में ही परचम नहीं होता
खुशी के घर में भी बोलो कभी क्या गम नहीं होता
फ़क़त इक आदमी के वास्ते जग छोड़ने वालों
फ़क़त उस  आदमी से ये ज़माना कम नहीं होता

Monday 6 July 2015

Old Women:A letter written by an old man for his beloved

बुढिया रे

बुढ़िया, तेरे साथ तो मैंने,

जीने की हर शह बाँटी है!


दाना पानी, कपड़ा लत्ता, नींदें और जगराते सारे,

औलादों के जनने से बसने तक, और बिछड़ने तक!

उम्र का हर हिस्सा बाँटा है 

तेरे साथ जुदाई बाँटी, रूठ, सुलह, तन्हाई भी,

सारी कारस्तानियाँ बाँटी, झूठ भी और सच भी,

मेरे दर्द सहे हैं तूने,

तेरी सारी पीड़ें मेरे पोरों में से गुज़री हैं,


साथ जिये हैं 

साथ मरें ये कैसे मुमकिन हो सकता है ?

दोनों में से एक को इक दिन,

दूजे को शम्शान पे छोड़ के,

तन्हा वापिस लौटना होगा ।

बुढिया रे!

Sunday 5 July 2015

A poem on sacrifice of two lovers



मां बाप की इज्जत को बचाया होगा उसने बेटी होने का फर्ज निभाया होगा




प्रेमिका की शादी कहीं और हो जाती है तब प्रेमी कहता है...


आज दुल्हन के लाल जोङे में उसकी सहेलियों ने सजाया होगा

मेरी जान के गोरे हाथों पर सखियों ने मेहंदी को लगाया होगा

बहुत गहरा चढेगा मेहंदी का रंगा उस मेहंदी में उसने मेरा नाम छुपाया होगा 


रह रहकर रो पङेगी जब भी उसे मेरा ख्याल आया होगा

खुद को देखेगी जब आइने में तो अक्श उसको मेरा भी नजर आया होगा

लग रही होगी एक सुंदर सी बाला चांद भी उसे देखकर शर्माया होगा


आज मेरी जान ने अपने मां बाप की इज्जत को बचाया होगा उसने बेटी होने का फर्ज निभाया होगा

मजबूर होगी वो बहुत ज्यादा सोचता हुं कैसै खुद को समझाया होगा

अपने हाथों से उसने हमारे प्रेम खतों को जलाया होगा

खुद को मजबूर बनाकर उसने दिल से मेरी यादों को मिटाया होगा

भूखी होगी वो मैं जानता हुं पगली ने कुछ ना मेरे बगैर खाया होगा

कैसे संभाला होगा खुद को जब फैरों के लिए उसे बुलाया होगा


कांपता होगा जिस्म उसका जब पंडित ने हाथ उसका किसी और के हाथ में पकङाया होगा

रो रोकर बुरा हाल हो जाएगा उसका जब वक्त विदाई का आया होगा

रो पङेगी आत्मा भी दिल भी चीखा चिल्लाया होगा 

आज उसने अपने मां बाप की इज्जत के लिए उसने अपनी खुशियों का गला दबाया होगा

Saturday 20 June 2015

Koi Deewana Kehta Hai

Koi Deewana Kehta Hai 
- Dr.Kumar Viswas

“Koi Deewana Kehta Hai Koi Pagal Samajhta Hai
Magar Dharti Ki Bechani Ko Bus Badal Samajhta Hai
Mein Tujhse Door Kaisa Hoon, Tu Mujhse Door Kaisi Hai
Ye Tera Dil Samajhta Hai Ya Mera Dil Samajhta Hai
K Mohhabat Ek Ehsason Ki Pavan Si Kahani Hai
Kabhi Kabira Deewana Tha Kabhi Meera Deewani Hai
Yahan Sab Log Kehte Hain Meri Aakhon Mein Aansu Hai
Jo Tu Samjhe To Moti Hai Jo Na Samjhe To Pani Hai
Samander Peer Ka Aander Hai Lekin Ro Nahi Sakta
Ye Aansu Pyar Ka Moti Hai Isko Kho Nahi Sakta
Meri Chahata Ko Dulhan Tu Bana Lena Magar Sun Le
Jo Mera Ho Nahi Paya Wo Tera Ho Nahi Sakta
Bhramar Koi Kumudani Par Machal Baitha To Hungama
Hamare Dil Mein Koi Khawab Pal Baitha To Hungama
Aabhi Tak Doob Kar Sunte The Sab Kissa Mohhabat Ka
Mein Kisse Ko Hakikat Mein Badal Baitha To Hungama”

Sunday 29 March 2015

Song Of Love



I am the lover’s eyes, and the spirit’s wine, and the heart’s nourishment.
I am a rose.
My heart opens at dawn and the virgin kisses me and places me upon her breast.
I am the house of true fortune, and the origin of pleasure, and the beginning of peace and tranquillity.
I am the gentle smile upon his lips of beauty.
When youth overtakes me he forgets his toil,
And his whole life becomes reality of sweet dreams. 

I am the poet’s elation,
And the artist’s revelation,
And the musician’s inspiration.

I am a sacred shrine in the heart of a child, adored by a merciful mother.

I appear to a heart’s cry; I shun a demand;
My fullness pursues the heart’s desire;
It shuns the empty claim of the voice.

I appeared to Adam through Eve
And exile was his lot;
Yet I revealed myself to Solomon, and he drew wisdom from my presence.

I smiled at Helena and she destroyed Tarwada;
Yet I crowned Cleopatra and peace dominated the Valley of the Nile.

I am like the ages – building today and destroying tomorrow;
I am like a god, who creates and ruins;
I am sweeter than a violet’s sigh;
I am more violent than a raging tempest.

Gifts alone do not entice me;
Parting does not discourage me;
Poverty does not chase me;
Jealousy does not prove my awareness;
Madness does not evidence my presence.

Oh seekers, I am Truth, beseeching Truth;
And your Truth in seeking and receiving
And protecting me shall determine my behaviour. 

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